शादी के बाद भी पति ने पत्नी का चेहरा तक नहीं देखा। अपमान, चुप्पी और हिम्मत के बीच अंजली कैसे अपने आत्मसम्मान के लिए आवाज उठाती है—पढ़ें यह भावुक कहानी।
शादी के बाद भी उन्होंने मुझे देखा नहीं | हिन्दी कहानी । Emotional Hindi Story | Moral Story | Hindi kahani। लव स्टोरी । Emotional story in hindi।
मेरा नाम अंजली है। शादी को एक महीना हो गया है, लेकिन शायद ही कोई ऐसा पति होगा जिसने पूरे एक महीने तक अपनी पत्नी का चेहरा तक नहीं देखा। शादी के पहले दिन से लेकर आज तक मैं अपने ही घर की ननंद के कमरे में, वो भी फर्श पर एक कोने में सोती रही हूँ। यह सब मेरी कल्पना से बहुत दूर था—खासकर किसी लड़की की नई जिंदगी की शुरुआत के लिए।
मेरे पिता गरीब हैं। हम लोग शहर वाले नहीं थे गाँव मे रहते थे पिताजी को मेरी शादी की चिंता खाये जा रही थी उनकी चिंता देख मुझे भी फ़िक्र होती थी। एक दिन उनके एक परिचित अंकल ने बताया कि एक बहुत बड़े और पैसे वाले घर से रिश्ता आया है—जल्दी शादी करनी है, वरना मौका हाथ से निकल जाएगा। पिताजी को पहले लगा की बेटी को कही गलत जगह ना भेज दू लेकिन अंकल ने विश्वास दिलाया की बेटी सही जगह जा रही है, उनकी बेटी को खाने-पीने की कमी नहीं होगी। बिना ज्यादा सोचे शादी की तारीख पक्की हो गई। मेरे लिये यह नया था क्यों की मिलना देखना कुछ भी नहीं हुआ था। मैंने उन्हें ना उन्होंने मुझे देखा था।
शादी के बाद मैं एक शानदार घर में तो आ गई, लेकिन यहाँ मेरी कोई पहचान नहीं थी—न बहू की, न पत्नी की।
घर में कोई मुझसे बात तक नहीं करता। मुझे सिर्फ काम दिया जाता—सुबह से शाम तक। रात को ननंद के कमरे में एक कोना, जहाँ वह मुझे नौकरानी की तरह डांट-डांटकर रखती। जहां मैं सोती, वहीँ कचरा फेंक दिया जाता। यह सब सहते हुए मैं सोचती—अगर शादी का यही मतलब है, तो शायद अकेली रहना ही बेहतर था।
धीरे-धीरे मुझे घर में काम करने वाली नौकरानियों से ही अपनापन मिला। आखिर मैं भी वहीं जैसी बनकर रह गई थी। एक दिन उनमें से एक ने बताया कि मेरे पति की पहले एक बहुत बड़े घर में शादी तय थी, वह लड़की उनसे बहुत प्यार भी करती थी। लेकिन अचानक कुछ विवाद हो गया और रिश्ता टूट गया। कार्ड तक छप चुके थे। उसी झटके में, उसी तारीख पर, बदले की भावना से—उनकी और मेरी शादी कर दी गई।
तब जाकर मुझे समझ आया—मैं इस घर में बहू बनकर नहीं, उनकी जिद और अहंकार बचाने के लिए आई हूँ।
लेकिन मैंने चुप रहकर सहना बंद करने का फैसला कर लिया।
कई दिनों बाद एक सुबह पता चला कि मेरे पति घर पर हैं। वह अपने कमरे में खाना खाएँगे। पहली बार मैंने तय किया कि मैं खुद खाना लेकर जाऊँगी। जब उनके सामने पहुँची, तो उन्होंने बिना मेरी तरफ देखे कहा,
“खाना टेबल पर रख दो।”
मैंने खाना रखा, और उनके सामने रखी कुर्सी पर बैठ गई।
वह चौंक पड़े—
“तुम कौन हो? ऐसे यहाँ कैसे बैठ गई?”
उनकी आवाज में घमंड भी था और गुस्सा भी।
उनकी माँ दौड़कर आईं। उन्होंने मुझे देखते ही कहा, “यह यहाँ क्या कर रही है?”
मैंने पहली बार धीरे, लेकिन बहुत साफ आवाज़ में कहा—
“यह मेरे पति का कमरा है… और मैं उनकी पत्नी हूँ। क्या मैं यहाँ नहीं बैठ सकती?”
मेरी बात सुनकर सबकी बोलती बंद हो गई। उन्हें पहली बार पता चला कि मेरे मुँह में भी जुबान है।
मैंने आगे कहा—
“शादी का मतलब आप जानते हैं? आज से पहले आपने मुझे देखा तक नहीं। आप सब मुझे नौकरानी की तरह रखते हैं। क्या मुझे खरीदकर लाए हैं? आप अमीर हैं, पर दिल कहाँ है? मुझे आपके बड़े घर में नहीं, आपके दिल में जगह चाहिए थी। जो शायद मुझे कभी नहीं मिलेगी। इसलिए… मैं जा रही हूँ।”
मैं मुड़ी ही थी कि मेरे पति ने मुझे रोक लिया।
उनकी आवाज मे प्यार ना सही पर हमदर्दी जरूर थी —
“अंजली… मैं अपनी पिछली जिंदगी भूल नहीं पाया था, इसलिए तुमसे दूर रहा। लेकिन तुम सही हो। तुम कोई सामान नहीं हो—मेरी पत्नी हो। मुझे माफ़ कर दो… और थोड़ा समय दो।”
उस दिन पहली बार मैंने उनके चेहरे पर इंसानियत देखी।
उन्होंने कहा—
“आज से तुम यहीं, इसी कमरे में रहोगी… पत्नी की तरह। नौकरानी की तरह नहीं।”
उस दिन ने मेरी जिंदगी बदल दी।
मैंने भी समझ लिया—
इस घर में बिना आवाज उठाए कोई जगह नहीं देता। अपने अधिकार खुद लेने पड़ते हैं। मैं धीरे-धीरे अपने लिए सम्मान बनाती गई। घर वाले अभी भी पूरी तरह नहीं बदले हैं, लेकिन बदलाव शुरू हो चुका है। ननंद और सास अब पहले जैसा व्यवहार नहीं करतीं। और मेरा पति… धीरे-धीरे मुझे स्वीकार करने लगा है।
मैं गरीब हूँ—पर डरपोक नहीं।
यह घर अब मेरा है, क्योंकि मैंने अपने लिए आवाज उठाना सीख लिया है।
इस कहानी का उद्देश्य केवल मनोरंजन करना है। इसमें दर्शाए गए सभी पात्र, घटनाएँ और स्थान काल्पनिक हैं। किसी भी जीवित या मृत व्यक्ति से समानता मात्र संयोग होगा। पाठक अपनी समझ और विवेक का उपयोग करें।

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