एक फुटपाथ पर रहने वाले 10 साल के बच्चे की इमोशनल कहानी, जिसे बस एक फोटो चाहिए थी, और शायद दुनिया से उसने कुछ ज्यादा माँग लिया था । Emotional story in Hindi. Hindi kahani. Hindi Stories. New hindi Story. New Emotional Hindi kahani. हिंदी कहानियाँ. नई कहानियाँ. छोटी कहानियाँ. अच्छी कहानियाँ.
हिन्दी कहानी - बस एक फोटो..। Emotional story in Hindi. Hindi story.
वो सड़क… और वो फुटपाथ… कब से उसका घर बन गए थे—ये उसे भी ठीक-ठीक याद नहीं था। दुनिया ने उसका नाम रख दिया था “कालू”। किसी ने कभी पूछा नहीं कि उसका असली नाम क्या है, और शायद उसे भी पता नहीं होगा जब से सुना उसने कालू ही सुना ।
उम्र कोई दस बरस होगी, लेकिन आँखों में उम्र से कहीं ज़्यादा समझ उतर आई थी। शायद भूख ने जल्दी बड़ा कर दिया था उसे… या फिर दुनिया की बेरुख़ी ने। सुबह होती तो फुटपाथ की ठंडी ज़मीन उसके शरीर को जगा देती। आसमान ही उसकी छत था और सड़क उसकी दुनिया।
दिन भर लोग आते-जाते रहते—कोई तेज़ क़दमों से, कोई मोबाइल में झुका हुआ, कोई हँसता हुआ, कोई ग़ुस्से में। वो सबको देखता था… चुपचाप। बिना सवाल किए। इतनी कम उम्र मे उसे समझ आ गया था की इस बड़ी दुनियाँ से कोई भी उम्मीद लगाना बेवकूफी है. यहाँ सभी को कुछ ना कुछ चाहिए इसलिए दौड़े जा रहे है, इधर से उधर वो सब को देखता ।
इसलिए उम्मीद लोगो से लगाना उसने बहुत पहले छोड़ दिया, लेकिन उस दिन… न जाने क्यों उसके मन में एक अलग ही ख्वाहिश जन्म ले बैठी। उसे पता था की उसकी कुछ भी ख्वाहिश करना गलत है वो उसका सपने देखना ख्वाहिश करना गुनाह के बराबर है पर उससे यह गुनाह हो गया
वो एक चौराहे पर बैठा था। चारों तरफ़ लोग खड़े थे—कोई सेल्फ़ी ले रहा था, कोई वीडियो बना रहा था। मोबाइल की स्क्रीन में लोग अपने चेहरे देख रहे थे, हँस रहे थे, पोज़ बदल रहे थे। वो बड़ी देर तक ये सब निहारता रहा। उसने कभी खुद को ठीक से भी नहीं देखा था। आईने का भला क्या काम, सड़क के दोनों ओर कांच के गेट वाली दुकानों की भरमार थी.
लेकिन वो धुंधला होता ।
उस दिन उसे बस इतना जानना था— “मैं फोटो में कैसा लगता हूँ?” दिल ज़ोर से धड़क रहा था, फिर भी उसने हिम्मत जुटाई। एक आदमी के पास गया। धीमे से बोला—
“भैया… क्या आप मेरी एक फोटो ले देंगे?”
आदमी ने ऊपर से नीचे तक देखा। नाक सिकोड़ते हुए बोला— “हट जा, काम है मुझे।” वो बिना कुछ कहे पीछे हट गया।
फिर एक और महिला मिली। इस बार आवाज़ और धीमी थी। “आंटी… बस एक फोटो…” महिला ने मोबाइल कस कर पकड़ लिया। “दूर रहो! फोन खराब कर दोगे!” उसे डर था की कहीं मोबाइल लेकर ना भाग जाये डर तों उनका भी जायज था
हर ‘ना’ उसके भीतर कुछ तोड़ रही थी। फिर भी उसने कोशिश नहीं छोड़ी। एक नौजवान से बोला। वो हँसा। “फोटो तों ले लूँ पर पहले नहा कर और यह फटे कपडे बदल कर आ समझा?” वो वाक्य… सीधे दिल के बीचों-बीच लगा। अब वो चुप हो गया। फुटपाथ पर आकर बैठ गया। घुटनों में सिर छुपा लिया। शायद उसकी ख्वाहिश ज़्यादा बड़ी थी।
तभी… किसी ने सामने से आवाज़ दी—
“अरे बेटे, उदास क्यों हो?”
वो चौंक गया। सामने एक सज़्जन खड़े थे। साफ़ कपड़े, चेहरे पर सादगी, आँखों में अपनापन। “कुछ नहीं…” उसने जवाब दिया, लेकिन आवाज़ काँप गई।
“फोटो का शौक़ है?” सज़्जन ने पूछा।
वो मुस्कुराया। “शौक़ नहीं… बस एक बार देखना था कि फोटो में मैं कैसा लगता हूँ।”
कुछ पल की ख़ामोशी। फिर सज़्जन ने मोबाइल निकाला।
“आओ, यहाँ खड़े हो जाओ।” वो डरते-डरते खड़ा हुआ।
अपने फटे कपड़ों को ठीक करने की कोशिश की। बालों पर हाथ फेरा। क्लिक। “देखो।” मोबाइल उसकी तरफ़ बढ़ा दिया गया। स्क्रीन पर वही था… वही चेहरा, वही आँखें। लेकिन पहली बार उसे लगा— “ये भी किसी इंसान का चेहरा है।” उसकी आँखें चमक उठीं। “बस इतना ही?” सज़्जन ने पूछा।
वो कुछ बोल पाता, उससे पहले ही सज़्जन बोले— “रुको।” थोड़ी देर बाद वो एक फोटो स्टूडियो से लौटे। हाथ में एक बड़ा सा काग़ज़ था। “ये लो।” उसने हाथों से पकड़ लिया। अपनी पहली छपी हुई तस्वीर। उसने तस्वीर को सीने से लगा लिया। आँखें भर आईं। “धन्यवाद…” बस इतना ही कह पाया।
वो उछलता हुआ वापस फुटपाथ की ओर दौड़ पड़ा। जैसे कोई खज़ाना मिल गया हो। उस शाम उसने वो फोटो अपने पास रख कर सोया। वो अपनी दुनियाँ ने वापस आ गया.
ले लो तुम ज़माने भर की दौलते, मुझे मेरी तस्वीर मिल गई बस यही काफी है.

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