माँ थी या नहीं—सालों बाद खुला सच। Mystry story।Suspense Story in Hindi।New Mystry Thriller Hindi Kahani हिन्दी कहानी Hindi story .



बचपन से उसने अपनी माँ को नहीं देखा था कोई तस्वीर ना कोई याद.. लेकिन फिर उसे एक ऐसी सच्चाई पता चली जिसपे उसे भी यकीन नहीं हुआ. Hindi suspense story. Hindi kahani. Hindi Stories. Emotional suspense hindi kahani.

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मेरा अधूरापन-  

क्या कोई ऐसा भी होगा जिसने अपनी माँ का चेहरा भी कभी ना देखा हो? ना कोई तस्वीर, ना कोई पहचान, ना कोई याद… कुछ नहीं। हाँ, मैं वही हूँ। मेरे पैदा होते ही मेरी माँ गुजर गई। और जैसे किसी पुरानी परंपरा की तरह, मेरे पिता ने मुझे जन्म का दोषी मानकर छोड़ दिया। 

माँ थी या नहीं - suspense story


कहते हैं—“जिसे देखना नहीं होता, उसे भूलना आसान होता है।” पिताजी ने मुझे ऐसे भुला दिया, जैसे मैं कभी था ही नहीं। मेरी पूरी दुनिया बस एक कमरे की दीवारें और अधूरी रोटियों की भूख थी। कोई मुझे संभालने वाला नहीं था मुझे नहीं पता मेरे होश सँभालने और समझने तक किसने मुझे संभाला उसके बाद मैंने खुद को अकेला ही पाया 

लेकिन… जिंदगी में एक छाया थी, एक परछाई… एक “ताई।”  ताई – मेरी अनदेखी पहरेदार जब भी भूख के मारे पेट मरोड़ने लगता, जब भी मुसीबतें मुझे नोचने आतीं, जब भी मैं गलत रास्तों की तरफ मुड़ने लगता… वो कहीं से अचानक आ जाती। कभी रोटी लेकर कभी मेरी हिम्मत बढ़ाने कभी मुझे गलत रास्तो पर जाने से रोकने. मुझे काम दिलाने वाली मुझे स्कूल जाने की सिख देने वाली भी वही थी 

लेकिन शायद वो भी मुझे अपने पास नहीं रखना चाहती थी मैंने कई बार कहा आप मुझे अपने घर क्यों नहीं ले जाती वो बस यही कहती मे तुम्हे अपने साथ नहीं ले जा सकती। 

ना कोई रिश्ता, ना कोई बंधन, फिर भी… वो ऐसे संभालती जैसे मैं उसका अपना सब कुछ हूँ। कभी-कभी मुझे लगता… वो मेरे लिए ही बनी है। मेरे इर्द-गिर्द एक अदृश्य ढाल की तरह। 

मे यहाँ वहाँ काम करके जैसे तैसे अपनी पढ़ाई करता रहा ताई हमेशा मुझसे कहती थी इन सब चीजों से बाहर निकलना है तों मुझे पढ़ना होगाl मैं पढ़ाई में अच्छा निकला, नौकरी मिली, और अब मैं अपने पैरों पर खड़ा था। लोग कहते—“तुम अकेले कैसे बड़े हुए?” मैं बस मुस्कुरा देता— “मुझे कोई संभालने वाला था… बस नाम का पता नहीं।”

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ताई ने तों मे अपनी मर्जी से मिल नहीं सकता था कुछ समय बाद मैंने उन्हें बोलना भी छोड़ दिया मैंने कई बार कहा की अब आप मेरे साथ रह सकती है पर  हमेशा की तरह उनका यही जवाब होता ऐसा नहीं हो सकता। पता नहीं उनकी बाते मुझे समझ नहीं आती। मैं कहता था की आप को इस उम्र मे कही कुछ हो गया तों मुझे पता भी नहीं चलेगा मे आपका ख्याल रखूँगा। उनका जवाब हमेशा की तरह बस मुस्कुराना होता। वो मेरे लिये एक पहेली से कम नहीं थी, पर मे यह सोच कर चुप हो जाता की कही यह भी मुझसे नाराज ना हो जाये।

ताई एक दिन आयी और फिर से अपनी पहेलियाँ बुझाने लगी। कहती है बेटा अब तुम बड़े हो गए अब मुझे कोई डर ना फ़िक्र है अब मे तुमसे ना भी मिलु तों कोई हर्ज नहीं है। मैंने कहा की आप ऐसा क्यों बोल रही है. ताई की उस बात को मैंने उनकी और बातो की तरह लिया।

ऐसे ही एक दिन मुझे खबर मिली की मेरे पिता इस दुनिया मे नहीं रहे, उन्होंने मुझे छोड़ दिया लेकिन मैं जैसे ही कुछ लायक हुआ उनके लिये खड़ा हो गया था। और ऐसा करने को भी मुझे ताई ने ही बोला था। उन्होंने समझाया की प्रेम करो नफरत नहीं हालांकि मे उन्हें माफ़ नहीं कर पाया, लेकिन उनके अचानक चले जाने से मुझे दुख हुआ।


मुझे जाना पड़ा अपना फर्ज़ निभाने, वही मेरी वहाँ पिताजी के जानकरो से मुलाक़ात हुई एक बुजुर्ग से बातचीत मे पता चला की वो मेरे पिता और माँ दोनों को जानते थे। उन्होंने कहाँ की शायद उनके पास मेरी माँ की तस्वीर है इतने सालो के बाद मुझे लगा की अब हो सकता है मे अपनी जन्म देने वाली माँ की शक्ल तों देख सकूंगा मे उनके साथ उनके घर गया 


दीवारों पर पुराने फ्रेम, पीले पड़े फोटो, धुंधली यादें। फिर उन्होंने एक पुराना ट्रंक खोला। कपड़ों के बीच से एक फोटो निकाली… और तस्वीर मेरे हाथ में रखते ही दुनिया थम गई। --- 5. तस्वीर में जो चेहरा था… मेरे हाथ काँप रहे थे। दिल धड़कने लगा, सांस थम सी गई। तस्वीर में जो थी… वो और कोई नहीं… मेरी ताई थी। मेरी आँखों से आँसू खुद-ब-खुद बह निकले। शरीर जैसे सुन्न पड़ गया। मैंने काँपती आवाज़ में पूछा— “ये… मेरी माँ हैं?” वो बुज़ुर्ग बोले— “हाँ बेटा… यही तुम्हारी माँ है। तुम्हारे पैदा होते ही यह इस दुनिया से चली गई थी 



और जैसे मेरी आँखें खुली की खुली रह गईं।मेरी साँसें वहीं रुक गईं।मेरी उंगलियाँ कापँने लगीं।दुनिया एक ही पल में धीमी पड़ गई।

तस्वीर में वही चेहरा था। 

वही चेहरा…
जिसे मैं बचपन से ‘ताई’ कहकर पुकारता आया था।
जो हर बार तब आती थी जब मैं भूखा होता था।
जब मैं गलती करने लगता था।
जब मैं गलत राह पर भटकने वाला होता था।
जब मैं मदद के लिए रोता था।

ताई… वही।
और वही मेरी माँ…

मेरे पैरों में जैसे ज़मीन खिसक गई।

मैंने तस्वीर दोबारा देखी।

वही आँखें।
वही मुस्कान।
वही सादगी।
सब कुछ… बिल्कुल वैसा ही।

लेकिन…
एक भारी, डराने वाला सवाल मेरे पूरे दिमाग में बिजली की तरह कौंधा—

मेरी माँ तो मेरे जन्म लेते ही मर गई थी…
तो फिर वो कैसे मेरे पास आती रहीं?

मैंने तेजी से सोचना शुरू किया— वो वक्त… जब मैं बहुत बीमार था और कोई भी पास नहीं था— अचानक वो आ गई थीं।

वो रात… जब मैं स्टेशन पर भूखा सो रहा था—उन्होंने मेरे हाथ में खाना रख दिया था।

वो दिन… जब मैं गलत लोगों के साथ जा रहा था—उन्होंने मेरा हाथ खींचकर रास्ता बदल दिया था।

और वो हमेशा आती थीं…लेकिन उतनी ही तेजी से गायब भी हो जाती थीं।जैसे… हवा में घुल जाती हों।जैसे कोई परछाई हो सिर्फ़ मेरे लिए।

मैंने तस्वीर को थोड़ा दूर किया और काँपती आवाज़ में खुद से कहा—

“क्या वो… सच में…
जाने के बाद भी…
मुझे देखने आती रही…?”

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शायद वो कभी गई ही नहीं थीं। शायद वो हमेशा मेरे आसपास थीं— कभी छत की परछाई बनकर,कभी अँधेरे में धीमी आहट बनकर, कभी किसी अजनबी की मदद बनकर।

इसलिए कभी भी वो मुझे अपने साथ नहीं ले जाती थी, यह राज था उनकी पहेली भरी बातों का 



मेरी आँखों से आँसू टपकने लगे।

मैंने तस्वीर अपने सीने से लगा ली…

और पहली बार…
पहली बार अपने जीवन में महसूस किया—

मैं कभी अकेला था ही नहीं।
वो मेरे हर कदम पर साथ थीं।


मैंने धीरे से तस्वीर को देखा और फुसफुसाया—
“माँ…
आपको अब पहचान लिया।
आप कहीं भी हों…
मुझे पता है…
आप यहीं हो।”

मैं कमरे से बाहर निकला—
दिल भारी था, पर खाली नहीं। मुझे पता था की माँ अब नहीं आएगी उनकी आखिर मुलाक़ात मे कही बातो का मतलब मुझे अब समझ आया था। 



Disclaimer:
यह suspense story in hindi एक कल्पनात्मक रचना है। इसमें दर्शाई गई आत्मिक उपस्थिति, रहस्य या किसी अदृश्य सहयोग का हम न तो समर्थन करते हैं और न ही इसे वास्तविक मानने के लिए प्रेरित करते हैं। कहानी में निहित सभी घटनाएँ, पात्र और परिस्थितियाँ केवल मनोरंजन  देने के उद्देश्य से प्रस्तुत की गई हैं। किसी भी वास्तविक व्यक्ति,  घटना से समानता मात्र संयोग है। कहानी को पढ़ते समय पाठक अपने विवेक का उपयोग करें। यह केवल मनोरंजन की दृष्टि से लिखी गई है कृपपा इसे उसी तरह से पढ़े। 





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