जब किसी ने पूछा - शर्म नहीं आती तुमको? - लघुकथा - Hindi kahani. Hindi short story


हमारी हिंदी कहानियों की श्रृंघला में एक और Emotional story in Hindi जुड़ गई है। यह हिंदी कहानी (Hindi story ) ना सिर्फ एक इमोशनल कहानी बल्कि प्रेरणादायक हिंदी कहानी ( Inspiration Story in hindi) भी है. यह लघुकथा आपको प्रेरित भी करेंगी और आपके दिल को छू भी लेगी।


जब किसी ने मुझसे यह पूछा— “शर्म नहीं आती तुमको?” तो पहली बार मुझे यह समझ आया कि इस दुनिया में लोग काम से नहीं, काम करने वाले इंसान से शर्म दिलाने की कोशिश करते हैं। मगर मुझे उससे पहले एक और शर्म का एहसास था — शर्म उन हालातों की जो मुझे और मेरे परिवार को उस मुकाम पर ले आए जहाँ दूसरों की राय, तानों, और उनकी नजरों का बोझ मुझे रोज़ महसूस होने लगा था। लेकिन क्या सच में मुझे शर्म आनी चाहिए थी? या फिर उन लोगों को, जो किसी की मेहनत पर उंगली उठाने से पहले उसकी मजबूरी, उसकी तकलीफ़ें और उसके संघर्ष को समझने की कोशिश भी नहीं करते? 
Emotional story in Hindi Inspiration Hindi story.


जब किसी ने पूछा - शर्म नहीं आती तुमको? - लघुकथा - Hindi kahani. Hindi short story.


शर्म नहीं आती Hindi kahani. इमोशनल कहानी


मेरी ज़िंदगी कभी इतनी उलझी नहीं थी। हम एक छोटा-सा परिवार थे— तीन बहनें और सबसे छोटा एक भाई। हमारे पास ज्यादा कुछ नहीं था, लेकिन हमारे घर में प्यार की, भरोसे की और उम्मीद की कभी कमी नहीं रही। पिताजी अक्सर कहते थे— “बेटा, गरीबी कोई शर्म की बात नहीं। शर्म की बात तो कोशिश छोड़ देना है।” 

हमारे घर की पुरानी छत, बार-बार बुझ जाने वाला टेबल लैंप, रात को आधे पेट सो जाना — इन सब पर भी पिताजी की मुस्कान कभी कम नहीं हुई। वे हमेशा कहते— “मैं अपने बच्चों को पढ़ाऊँगा, ताकि इन्हें वो संघर्ष दोबारा ना सहना पड़े जो मैं झेल चुका हूँ।” उनकी यही सोच हमें आगे बढ़ाती थी। मैं सबसे बड़ी थी, इसलिए उनसे सबसे ज्यादा उम्मीदें भी मुझसे थीं। पिताजी को मुझ पर भरोसा था, और शायद उसी भरोसे ने मुझे खुद पर विश्वास दिलाया। 

काफी मुश्किलों के बाद मैंने इंजीनियरिंग में एडमिशन ले लिया। उस दिन मुझे लगा जैसे मेरी नहीं, हमारे पूरे परिवार की जिंदगी बदलने वाली है। इंजीनियरिंग का सर्टिफिकेट शायद सिर्फ काग़ज़ होता है, पर हमारे लिए वो गरीबी की बेड़ियाँ तोड़ने का औज़ार था। इंजीनियरिंग के पहले तीन साल जैसे-तैसे निकले। कभी किताबें उधार लेकर पढ़ती, कभी अपनी पुरानी नोटबुक्स में नए टॉपिक लिखती। कभी-कभी फीस भरने के लिए घर का राशन काटना पड़ता था। पर घर में हमेशा एक ही बात कही जाती— “पढ़ाई नहीं रुकनी चाहिए।” और मैं भी नहीं चाहती थी कि पिताजी का सपना टूटे।

मेरे मन में सिर्फ एक ही इच्छा थी— कि मैं नौकरी पाकर सबसे पहले पिताजी के लिए नई चप्पल और आरामदायक कुर्सी खरीदूँ, क्योंकि पुराने दर्द और बरसों की थकान ने उनके पैरों को अपना घर बना लिया था। 

लेकिन जिंदगी… जिंदगी किसी की योजना से नहीं चलती। वो चलते-चलते अचानक चेहरे पर थप्पड़ मार देती है और फिर देखती है कि तुम गिरकर रोते हो या उठकर लड़ते हो। 

इंजीनियरिंग के आखिरी साल, सिर्फ छह महीने बचे थे कि जिंदगी ने हमारी दुनिया उलट दी। एक सुबह जब मैं कॉलेज जाने की तैयारी कर रही थी, माँ की चीख ने जैसे मेरे पैरों के नीचे की जमीन खींच ली। मैं भागकर कमरे में गई तो पिताजी बेहोश पड़े थे। हम उन्हें अस्पताल ले गए, पर वहाँ जो खबर मिली उसने हमें अंदर से तोड़ दिया— पिताजी नहीं रहे। 

उस एक पल में मेरी दुनिया की सारी रोशनी बुझ गई। वो इंसान जिसके कंधों पर जीवनभर हम टिककर जीते रहे, अब हमेशा के लिए हमसे दूर चले गए थे। न कोई विदाई, न कोई आखिरी बात… बस एक लंबी खामोशी जो आज भी मेरे दिल में गूंजती है। घर वापस लौटते समय मैंने माँ को देखा— उनका चेहरा सूज गया था, आँखें लाल थीं, और उनका दिल शायद हमसे भी ज्यादा टूटा था। छोटी बहनें डर के मारे मुझसे चिपकी हुई थीं, जैसे पूछ रही हों— “अब हम क्या करेंगे दीदी?” और सच कहूँ तो मुझे खुद नहीं पता था कि अब क्या होगा। 

उस रात मैंने आसमान की ओर देखा। पिताजी अब वहाँ कहीं थे, पर मैं उन्हें देख नहीं पा रही थी। मुझे ऐसा लगा जैसे किसी ने मेरे कंधों पर पूरा पहाड़ रख दिया हो। मेरी खुद की आँखें रो-रोकर सूज गई थीं, लेकिन मैं रोते-रोते बस एक ही बात सोच रही थी— अब ज़िम्मेदारी मेरी है। मैंने उस रात खुद से कई सवाल पूछे। क्या मैं पढ़ाई जारी रख पाऊँगी? क्या मैं घर चला पाऊँगी? क्या मेरे भाई-बहन अपनी पढ़ाई जारी रख पाएँगे? घर का किराया कैसे भरेंगे? दवाइयों, राशन, बिजली— सब कैसे होगा? इन सवालों ने जैसे मेरी नींद और मासूमियत दोनों छीन ली। 

लेकिन एक बात साफ थी— अब पीछे मुड़ने का कोई रास्ता नहीं था। या तो मैं टूटकर बैठ जाती, या फिर पिताजी की अधूरी ज़िम्मेदारियाँ अपने कंधों पर उठाकर आगे बढ़ती। और मैंने दूसरा रास्ता चुना। इंजीनियरिंग का आखिरी साल था— इसे छोड़ देना मतलब पिताजी की सारी मेहनत बेकार हो जाना। लेकिन सिर्फ पढ़ाई से घर नहीं चल सकता था। यहीं से मेरे संघर्ष की असली शुरुआत हुई— घर चलाना, परिवार संभालना और पढ़ाई पूरी करना, सब एक साथ…



संघर्ष की राह, टपरी का सफर और वह सवाल — “शर्म नहीं आती तुमको?” 

पिताजी के जाने के बाद घर जैसे सूना नहीं, बल्कि बिल्कुल बेजान हो गया था। हर कमरा, हर दीवार, हर कोना — सब जैसे पिताजी की कमी को ही दोहरा रहे थे। माँ की आँखें रो-रोकर लाल पड़ चुकी थीं, बहनों का डर उनके चेहरे पर साफ दिखता था, और मेरे भाई का मासूम सवाल — “दीदी, अब पापा कब आएँगे?” मुझे भीतर तक चीर गया था। लेकिन जिंदगी कभी भी दुख के लिए रुकती नहीं। दर्द चाहे जितना भी गहरा हो, रात के बाद सुबह तो आती ही है — बस फर्क इतना है कि कुछ लोग उस सुबह का सामना आँसुओं के साथ करते हैं, और कुछ लोग हिम्मत के साथ। 


मैंने हिम्मत चुनी। --- मैंने पढ़ाई और घर दोनों को साथ रखने का फैसला किया इंजीनियरिंग का आखिरी साल था। अगर मैं इसे छोड़ देती तो पिताजी का वो सपना भी मर जाता जो उन्होंने अपनी आखिरी सांस तक जिया था। लेकिन घर की हालत ऐसी थी कि सिर्फ पढ़ाई करके घर चलाना असंभव था। 

मैं नौकरी ढूँढने निकली, कई जगह इंटरव्यू दिया, लेकिन पार्ट टाइम नौकरी इतनी आसानी से कहाँ मिलती है? सबको फुल टाइम चाहिए, और कॉलेज की क्लास छोड़कर काम करना मेरे बस में नहीं था। एक दिन इसी चिंता में बैठी थी कि पिताजी की एक पुरानी बात याद आई— “कोई काम छोटा नहीं होता। छोटा सोचने वाले लोग होते हैं।” उस पल मुझे लगा कि मैं या तो हालात से हार जाऊँ या फिर पिताजी की सीख को जीऊँ। 

मैंने दूसरा रास्ता चुना। --- टपरी — मेरा पहला कदम, मेरी पहली जंग मैंने घर के सामने की पुरानी जगह, जो पहले पिताजी की साइकिल रखने के काम आती थी, उसे साफ़ किया। दो स्टूल खरीदे, एक पुरानी लकड़ी की मेज ली, एक बड़ा भगोना, कुछ चायपत्ती, बिस्कुट और एक छोटा गैस स्टोव। बस… यही था मेरा रेस्टोरेंट — एक छोटी-सी टपरी। सबसे पहले दिन जब मैंने चाय बनाई, हाथ काँप रहे थे। डर था, संकोच था, और भीतर एक अजीब सी घुटन — कि मैं इंजीनियरिंग की छात्रा होकर यह सब कर रही हूँ। 

लेकिन तुरंत मन में एक आवाज़ आई— “मेहनत करने वाला कभी छोटा नहीं होता।” पहला ग्राहक आया। दोनों हाथ काँपते-काँपते मैंने चाय दी। वो मुस्कुराया और बोला, “बढ़िया है! कल फिर आऊँगा।” उसकी वो मुस्कान शायद मेरे जीवन की वो पहली कमाई थी जिसने मेरे अंदर की हिम्मत को फिर से जगा दिया। --- 

लेकिन दुनिया तो ताने देने के लिए ही खड़ी है कुछ दिन बाद, जब टपरी थोड़ी चलने लगी, तो कुछ लोग ऐसे भी आये जिनके शब्द किसी चाकू से कम नहीं थे। एक आदमी ने चाय लेते हुए पूछा— “तुमने इंजीनियरिंग में एडमिशन लिया था ना? फिर ये टपरी? शर्म नहीं आती?” उसके साथ खड़े दो लोग हँस पड़े। 

ऐसा लगा जैसे मेरे सभी सपने, मेरी सारी मेहनत, मेरी मजबूरी… सब उनका मज़ाक बन गई हो। मैंने चाय की केतली के पास खड़े होकर अपनी आँखे पोंछ तो लीं, लेकिन दिल में एक सवाल जलने लगा— क्या मेहनत करना शर्म की बात है? या फिर मेहनत को नीचा दिखाना? मैंने मुस्कुराकर जवाब दिया— “मेहनत में कैसी शर्म सर? शर्म तो नहीं आती उन लोगों को जो मेहनत करने वालों को तंग करते हैं।” वो लोग चुप हो गए। 

पर उनके ताने मुझे कई दिनों तक चुभते रहे। --- परिवार मेरी जिम्मेदारी था — और जिम्मेदारी कभी ताने नहीं देखती हर दिन सुबह 5 बजे उठती, टपरी सजाती, फिर कॉलेज जाती, शाम को वापस आकर फिर चाय बेचती, और रात को माँ के साथ घर का हिसाब करती। कभी-कभी नींद इतनी आती कि कॉलेज की क्लास में आँखें भारी हो जातीं। पर जब भी थकान बढ़ती, पिताजी का वो सपना — मुझे इंजीनियर बनते हुए देखना मेरे दिल में फिर से जान भर देता। कई ग्राहकों ने मुझे प्रोत्साहन दिया। कई लोग सिर्फ मेरी हिम्मत देखकर चाय पीने आते। 

एक अंकल तो रोज़ कहते— “बेटा, तू करने वालों में से है। देखना, एक दिन ये टपरी तेरी बड़ी दुकान बनेगी।” उनकी ये बात मेरे लिए दवा की तरह थी। --- धीरे–धीरे टपरी मेरी पहचान बनने लगी जहाँ पहले लोग ताने देते थे, अब वही लोग तारीफ करने लगे। मेरी चाय की खुशबू ने धीरे-धीरे इलाके में अपनी जगह बना ली थी। मेरा तरीक़ा, मेरा व्यवहार, और मेरी संघर्ष की कहानी कई लोगों को प्रेरणा देने लगी। 

कई महिलाएँ अपने बच्चों को मेरे पास लाकर कहतीं— “इससे सीखो… काम कोई भी छोटा नहीं।” और कुछ युवा लड़कियाँ चुपचाप आकर बोलतीं— “दीदी, आप बहुत हिम्मती हो। आपकी वजह से हमें भी लगता है कि हम भी कुछ कर सकते हैं।” ये बातें मेरे लिए किसी पुरस्कार से कम नहीं थीं। --- इंजीनियरिंग पूरी हुई… पर असली जीत टपरी ने दिलाई लोगों ने सोचा था कि मैं संघर्ष में टूट जाऊँगी। लेकिन मैं टूटी नहीं। मैंने पढ़ाई भी पूरी की। और टपरी भी चलाई। 

आज मुझे खुद पर गर्व है कि मैंने पिताजी का सपना भी पूरा किया और अपनी जिम्मेदारी भी निभाई। आज मेरी वही टपरी एक मिनी-रेस्टोरेंट बन चुकी है। मेन्यू बढ़ गया है, ग्राहक बढ़ गए हैं, और मेरा आत्मविश्वास भी। जो लोग कभी कहते थे— “शर्म नहीं आती?” आज वही लोग अपने बच्चों को मुझे दिखाकर कहते हैं— “मेहनत सीखो, ये लड़की असली मिसाल है।” 

और मैं सिर्फ मुस्कुरा देती हूँ। क्योंकि मैं जानती हूँ — शर्म काम में नहीं, दिमाग में होती है। और मैंने अपनी सोच को कभी छोटा होने नहीं दिया। 


आशा करते है यह हिंदी कहानी ( hindi story ) लघुकथा आपको अच्छी लगी होंगी। इसी तरह की Emotional story in hindi और inspiration story in hindi आप यहाँ पढ़ सकते है।


यह हिन्दी कहानी( Hindi Story )पूरी तरह काल्पनिक है। इसमें वर्णित पात्र, स्थान, घटनाएँ या संवाद लेखक की कल्पना पर आधारित हैं। किसी भी जीवित या मृत व्यक्ति, वास्तविक घटना, संस्था या स्थान से कोई समानता केवल संयोग मानी जाएगी। कहानी का उद्देश्य केवल मनोरंजन है; इसका किसी भी प्रकार का सामाजिक, धार्मिक, सांस्कृतिक या नैतिक संदेश देने का दावा नहीं किया जाता। पाठक अपनी समझ से इसका उपयोग करें।


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